रविवार, अक्टूबर 24, 2021

दिल्ली में अफगान स्कूल पर अनिश्चितता के बादल

अफगानिस्तान में तालिबान राज आते ही पूरी दुनिया में मौजूद अफगानिस्तानी डरे हुए हैं। उन्होंने अफगानिस्तान से भाग कर जान तो बचा ली, लेकिन भारत में रह रहे अफगानी बच्चों की जिंदगी पर बुरा असर पड़ने लगा है।

दिल्ली के भोगल इलाके में जमाल-अल-दीन अफगानी नामक एक अफगान स्कूल है। यहां कक्षा 1 से 12वीं तक के लगभग 550 से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। इस स्कूल में अफगानिस्तान बोर्ड के तहत ही पढ़ाई होती है। अब तक इस स्कूल को चलाने के लिए हर तरह की वित्तीय सहायता अफगानिस्तान सरकार देती थी। लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद से इस स्कूल पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं।लेकिन स्कूल का प्रशासन इस स्कूल को किसी भी हालत में चलाना चाहता है।

स्कूल की प्रिंसिपल और निदेशक सानिया बताती हैं, जनवरी 2021 से अफगान सरकार की ओर से स्कूल को दी जाने वाली वित्तीय सहायता नहीं दी गई है।जिसके कारण बिल्डिंग का किराया, टीचर्स की फीस और अन्य खर्च का भार उठाना मुश्किल हो रहा है। इस स्कूल में जो बच्चे पढ़ते हैं वे बेहद गरीब परिवारों से हैं। ऐसे में इन बच्चों से अच्छी फीस लेना भी संभव नहीं है। अगर ये स्कूल बंद होता है तो इन बच्चों का भविष्य भी मुश्किल में पड़ जाएगा

सानिया ने दैनिक जागरण को बताया कि यहां टीचर्स और अन्य कर्मचारियों को मिला कर कुल 36 लोग काम कर रहे हैं। फिलहाल कोरोना को ध्यान में रखते हुए बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन कराई जा रही है। यहां बच्चों को फारसी में पढ़ाया जाता है ताकि उन्हें आसानी से समझ में आ सके।

वे आगे बताते हुए कहती हैं, हम अफगानिस्तान दूतावास से भी लगातार संपर्क में हैं। पर वहां से कोई राहत पहुंचाने वाला जवाब अब तक नहीं मिला है। भारत सरकार या अन्य संस्थाओं से भी सहायता के लिए कोशिश कर रहे हैं। हालात को देखते हुए बिल्डिंग के मालिक से भी किराया कुछ कम करने का अनुरोध किया गया है।

अफ़ग़ान एकजुटता समिति के सदस्य मोहम्मद क़ैस्मालिक ज़दा कहते हैं कि भोगल में जो अफगान स्कूल है, उसका किराया और टीचर्स का वेतन 8 महीने से हमारी पुरानी सरकार ने नहीं दिया। अब तालिबान की जो नई सरकार आई ,वो भी किराया नहीं दे रही है, तो स्कूल को बंद करना ही पड़ेगा।

जेएनयू में सेंटर ऑफ यूरोपियन स्टडीज में प्रोफेसर और अफगानिस्तान मामलों के विशेषज्ञ गुलशन सचदेवा के मुताबिक अब अफगानिस्तान का दूतावास ही इस स्कूल को मदद देने को लेकर आगे फैसला लेगा। अगर अफगानिस्तान की सरकार या दूतावास की ओर से भारत सरकार से इस स्कूल की मदद के लिए अनुरोध किया जाता है, तो इस पर भारत सरकार फैसला ले सकती है। लेकिन फिलहाल अफगानिस्तान में नई सरकार के गठन तक इंतजार करना होगा।

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