गुरूवार, नवम्बर 18, 2021

बांग्लादेश के पहले हिन्दू चीफ जिस्टिस को कोर्ट ने 11 साल जेल की सजा सुनाई, भ्रष्टाचार के मामले में थे आरोपी

बांग्लादेश की एक अदालत ने भ्रष्टाचार एवं विश्वास भंग से जुड़े एक मामले में मंगलवार को पूर्व और देश के पहले हिंदू चीफ जस्टिस सुरेंद्र कुमार सिन्हा को उनकी गैर मौजूदगी में 11 वर्षो की कारावास की सजा सुनाई। सिन्हा बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय से पहले प्रधान न्यायाधीश बने थे। ढाका के विशेष न्यायाधीश चतुर्थ शेख नजमुल आलम ने सुरेंद्र कुमार सिन्हा को मनी लॉन्ड्रिंग के दोष में सात वर्षो तथा आपराधिक विश्वास भंग के आरोप में चार वर्षो की कारावास की सजा सुनाई है। दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी। 70 वर्षीय सिन्हा अभी फिलहाल अमेरिका में रह रहे हैं।

अदालत ने अपने फैसले में कहा, चीफ जस्टिस सिन्हा भ्रष्टाचार में मिले राशि के मुख्य लाभार्थी हैं।” सिन्हा को फार्मर्स बैंक ,जिसे अब पद्म बैंक के नाम से जाना जाता है, से कर्ज के रूप में लिए गए 4,70,000 अमेरिकी डॉलर के मनी लॉन्ड्रिंग में 11 साल की कैद की सजा सुनाई गई। चार वर्ष पूर्व सिन्हा ने अपनी एक विदेश यात्रा के दौरान अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उसी समय सरकार ने उनपर भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप लगाया था।

सिन्हा जनवरी 2015 से नवंबर 2017 तक देश के 21वें चीफ जस्टिस रहे थे। सिन्हा आरोप लगाया है कि उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि उन्होंने बांग्लादेश के वर्तमान सरकार का विरोध किया था। इस मामले में दस अन्य लोगो को को बरी कर दिया गया क्योंकि उनके खिलाफ आरोप साबित नहीं किए जा सका है।

मामले के बयान के अनुसार अन्य आरोपियों ने फर्जी दस्तावेजों के दम पर 470000 अमेरिकी डॉलर का लोन लिया और उन पैसो को पे-आर्डर के जरिए सिन्हा के निजी बैंक एकाउंट में डाल दिया गया। पूर्व चीफ जस्टिस ने नकद, चेक और पे-आर्डर के माध्यम से यह पैसे दूसरे खाते में डाल दिये। ऐसा करना भ्रष्टचार रोकथाम अधिनियम और धनशोधन रोकथाम अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध है।

अपनी आत्मकथा ‘ए ब्रोकेन ड्रीम, रूल ऑफ लॉ , ह्यूमन राइट्स एंड डेमोक्रेसी’ में चीफ जस्टिस सिन्हा ने कहा कि 2017 में धमकी के जरिए उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया। प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कुछ निजी अखबारों पर जिस्टिस सिन्हा का समर्थन करने का आरोप लगाया था। पुस्तक के विमोचन के बाद सिन्हा ने भारत से बांग्लादेश में लोकतंत्र और कानून के शासन का समर्थन करने की अपील की थी।

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